मंगलवार, 20 मई 2008
nari tari ye hi jindagani
नारी को हमेशा विवादों रखना शायद पुरुष समाज कि जाने क्या मजबुरी है. कोन नहीं शुकुन से जीना चाहता चाहे वो नारी ही क्यों न हो .जब नारी घर से बाहर रोजी रोटी के लिए जाती है तब उस कि जिंदगी दोहरी और ताकन से भरि होती है क्यों कि घर आकर तो उसे ही घर कि सभी जिम्मेदारिया निभानी पड़ती है .खुद उस का जीवन इनसब में खो जाता है सारी जद्दो जाहत घर कि लिए होती है और बदले में उसे क्या मिलाता है उपेक्षा त्रिस्कर ,व्यग समाज का पर ममता कि मरी फिर भी खटतीहै और एक दिन खर्च होजाती है चली जाती है खामोशी से
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